मैं शून्य का विचार हूँ...!!

मैं शून्य का विचार हूँ...!!

चाहो तो मुझको जान लो,
यदि तुम जान पाओ तो!
मैं हूँ वहाँ, जहाँ सदा,
शून्यता प्रचंड हो,
ना तनिक भी कोई दंभ हो,
ना ताप हो, ना शीत हो,
मैं हूँ उन्हीं का अंश वह,
जिसका अंत भी अनंत हो।
मेरा वास है बस वहीं,
जहाँ शून्यता अखंड हो!

मैं शून्य के भी पार हूँ,
गीता-ग्रंथों का सार हूँ।
मैं गर्जना हूँ धर्म की,
मैं शून्य का विचार हूँ।

मैं भावना हूँ शून्य की,
जो हर हृदय में व्याप्त हो।
मैं नाद अखंड शांति का,
विनाशक हूँ अहंकार का।
अतीत जिसका कण नहीं,
वर्तमान का मैं क्षण नहीं,
भविष्य मेरी कल्पना,
मैं मात्र वो ही शून्य हूँ...

मुझे खोजते हो विश्व में,
दिन-रात और भविष्य में।
मैं स्रोत हूँ आरंभ का,
अंत जिसका सार हो।

मैं हूँ तुम्हारे हृदय में,
तुम हो मेरे ही केंद्र में।
मैं कल्पना हूँ भक्त की,
पर वह नहीं जो व्यक्त हो।

मैं पराकाष्ठा उस प्रेम की,
जो स्वयं में ही अनंत हो।
जहाँ शून्य और भावना का,
एक अलौकिक संगम हो।

यदि तुम मुझको जान लो,
तो इस सत्य को भी मान लो...
कि जान सकते तुम नहीं,
जो जानते वह सत्य नहीं।
मात्र मैं ही एक सत्य हूँ,
जो सर्वत्र और नित्य हूँ।

मैं जन्म का ही अंत हूँ,
मैं अंत का ही जन्म हूँ।
कल्पना के पार हूँ,
मैं शून्य का विचार हूँ।

क्या चाहते हो जानना?
पर क्या मुझे तुम जान पाओगे?
खोजोगे मुझको जितना तुम,
उतना ही खोते जाओगे।
जितना मुझे तुम जानोगे,
उतना ही स्वयं को भूलोगे।

क्यों चाहते हो तुम जानना,
मैं कौन हूँ, मैं कैसा हूँ?
जो जानते वह सत्य नहीं,
और सत्य को तुम ना जानते।
पहचानो अब स्वयं को तुम,
ना पुण्य को, ना पाप को।

यदि उद्देश्य को तुम जान लो,
तो एक क्षण को मान लो,
पहचानने लगे मुझे,
यह जानकर भी अनजान हो।
पर समझो उस शून्य को,
जहाँ भावना अनंत हो।

ना जन्म है, ना मृत्यु है,
हर कण ही मित्र-शत्रु है।
क्या तुम हो इस संसार में,
या संसार तुममें है कहीं?
ना जानते तुम स्वयं को,
अपने आप को आकार दो।

आकार इस प्रकार दो,
कि शून्य तुममें हो कहीं,
जहाँ शून्य में भी भावना,
और भावना में शून्य हो।

मैं वास करता शून्य में,
जहाँ शून्यता अनंत है!
मैं शून्य का विचार हूँ,
मैं शून्य का विचार हूँ।

~यश शर्मा


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