अंतर्द्वंद्व से उत्कर्ष
August 20, 2026•180 words
एक बार जब तुम खो जाते हो,
भीड़ में भी अकेले रह जाते हो,
मन ही मन रो जाते हो,
सोचते हो कि ये क्यों हो रहा है,
अब तुम नहीं तुम्हारा मन रो रहा है।
थक गए हो तुम प्रयास करके,
मन कहता है सो जाओ सब विराम करके,
पर परिस्थितियाँ साथ देती नहीं हैं,
शिकायतें मन से निकलती नहीं हैं,
झेलते हो सब ख्याल करके,
सोचते हो कि सब बयां कर दें,
पर होता नहीं कोई जो सुन सके तुमको,
इस उलझन में तुम ठहर जाते हो,
हो जाते हो गुम अपने ही सवालों में,
चल पड़ते हो आगे उम्मीद की राहों में।
उम्मीद तो पूरी होती नहीं है,
खुश रहने क...
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