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अंतर्द्वंद्व से उत्कर्ष

एक बार जब तुम खो जाते हो,
भीड़ में भी अकेले रह जाते हो,
मन ही मन रो जाते हो,
सोचते हो कि ये क्यों हो रहा है,
अब तुम नहीं तुम्हारा मन रो रहा है।

थक गए हो तुम प्रयास करके,
मन कहता है सो जाओ सब विराम करके,
पर परिस्थितियाँ साथ देती नहीं हैं,
शिकायतें मन से निकलती नहीं हैं,

झेलते हो सब ख्याल करके,
सोचते हो कि सब बयां कर दें,
पर होता नहीं कोई जो सुन सके तुमको,
इस उलझन में तुम ठहर जाते हो,

हो जाते हो गुम अपने ही सवालों में,
चल पड़ते हो आगे उम्मीद की राहों में।
उम्मीद तो पूरी होती नहीं है,
खुश रहने की इच्छा भी होती नहीं है,

उस दर्द की हो जाती है आदत,
मन स्वीकारता है उन परिस्थितियों को शायद,

पर अभी ताक़त तुममें बाकी है,
एक आस अभी भी बाकी है।
करके खून गरम अपना,
रच दो इतिहास नया अपना,

स्वीकार करो इस द्वंद्व को,
अपने अंतर में संयम लो,
एक साँस भरो अंदर तक तुम,
विश्वास रखो स्वयं पर तुम,
रख दो इतिहास बदलकर तुम...!!


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